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समानांतर साहित्य उत्सव: बाजारीकरण के विरुद्ध लेखकों का उत्सव

OmExpress News / Jaipur / गुलाबी नगरी का सर्द मौसम है, हाड़ कंपकंपाने वाली हवाएं हैं। वहीं, किताबों की खुशगवार दुनिया सजी है। पाँच मंच सजे हैं – भीष्म साहनी मंच, रांगेय राघव मंच,कन्हैया लाल सेठिया मंच, राग दरबारी मंच और नागार्जुन मंच। रविन्द्र मंच का समूचा परिसर रजिया ग्राम के स्वरूप में दिख रहा है। हवा में कविताओं के स्वर गूँज रहे हैं। कहानियों का पाठ हो रहा है। Parallel Literature Festival

कितने ही साहित्यकार, लेखक, विचारक और चिंतक विविध मंचों पर, अनेकानेक विषयों पर सम्वाद और चर्चाएं कर रहे हैं। साहित्य के बाजारीकरण के विरुद्ध प्रगतिशील लेखक संघ राजस्थान द्वारा आयोजित समानांतर साहित्य उत्सव का उद्धाटन दीप प्रज्जवलन के साथ किया गया। उद्घाटन सत्र में पीएलएफ के अध्यक्ष ऋतुराज ने बताया कि समानांतर साहित्य उत्सव कोई नया इतिहास लिखने कीहोड़ नहीं है, बल्कि बाजारवाद पर हस्तक्षेप करने की पहल है।

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तीन दिवसीय इस उत्सव में पांच मंचों में कुल 112 सत्र आयोजित होंगे, जिनमॆं साहित्य एवं समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों और विधाओं पर देश विभिन्न प्रांतों से आए लेखक विचार-विमर्श करेंगे। मंच पर न्यायमूर्ति विनोद शंकर दवे, ऋतु राज, डॉ.परीक्षित सिंह, नूर ज़हीर, प्रेमचंद गांधी और ईश मधु तलवार ने समानांतर साहित्य उत्सव मिल रहे लेखकों के अपार सहयोग के लिए आभार प्रकट किया। पीएलएफ के आरंभ में महासचिव ईश मधु तलवार ने कहा कि हमारा अंग्रेजी भाषा से कोई विरोध नहीं है, लेकिन उसके वर्चस्व के विरुद्ध है।

इस आयोजन में विभिन्न भाषाओं के लेखकों और उनके साहित्य पर भी सत्र रखे गए हैं । डॉ. परीक्षित सिंह ने वक्तव्य में बताया कि संवाद ही समाज की रीढ़ है और समानांतर साहित्य उत्सव में मंच अपनी वैचारिक दृढ़ता एवं शक्ति पर कायम है। इसी अवसर पर न्यायमूर्ति विनोद शंकर दवे ने लेखकों की शक्ति को समाज की शक्ति के रूप में बताया। नूर जहीर ने पीएलएफ से उम्मीद जताई कि यहां विचारों का मंथन होगा और बदलाव की कोशिश की जाएगी, क्योंकि विचार के बिना संसार को बदलना मुश्किल है। Parallel Literature Festival

पी एलएफ के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन ने कहा कि असली लेखक वह है जो दीपक के रूप में प्रकाश बांटता है। पीएलएफ जयपुर के संयोजक प्रेमचंद गांधी ने बताया कि इस दूसरे संस्करण में हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं का सम्मान करते हुए कई सत्र रखे हुए हैं। अंत में हिंदी की महान लेखिका कृष्णा सोबती को समस्त लेखकों द्वारा दो मिनट का मौन रखते हुए श्रद्धांजलि दी।

कहानी कही जाती है – उदय प्रकाश

कहानी की परंपरा बहुत पुरानी है, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है। जिसे कहा जा सके, वह कहानी है। जरा गौर कीजिए कहानी कोई सुनाता है, कहीं, आप सुनते हैं। अपने दिमाग में उस कहे को रखते हैं, फिर आप किसी और को सुनाते हैं। इस तरह हर कोई कहानीकार है। पूरा समाज कहानीकार है। यह कहना है दुनियाभर में मशहूर कथाकार उदय प्रकाश का। समानांतर साहित्य महोत्सव के पहले दिन के सत्र में “अच्छी कहानी क्या है” में उन्होंने कहानी को लेकर रोचक कहानियां सुनाई। उन्होंने कहा कि राजस्थान में तो पद्य में कहानी भुनाने की परंपरा भी रही है।

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उन्होंने डालूराम का किस्सा भी सुनाया, जो हर बार एक नई कहानी सुनाया करते थे। उसमें इतनी नाटकीयता और इतने अलंकार होते कि लोग उनका इंतजार करते और वे हर बार अपनी कहानी को रोचक मोड़ पर छोड़ देते थे। उन्होंने कहा कि उनकी कहानी इसलिए अच्छी कहानी थी कि उसमें उन्होंने अपनी पहचाह को पीछे छोड़ते हुए, जो भी सुनाने लायक लगा सुनाया।

मोहनदास कहानी के लिए मशहूर उदय प्रकाश ने यह भी कहा कि फर्क अब यह है कि कहानी अब छपा करती है। वे कहते हैं, जब भी मैं किसी कहानी पर अपना निर्णय सुनाता हूं तो ध्यान रहता है कि क्या मुझे ये लग रहा है कि कोई कहानी सुना रहा है। अच्छी कहानी से आवाज आती है, जहां से आवाज न आए वो अच्छी कहानी नहीं। इस सत्र में जाने-माने समीक्षक डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने उदय प्रकाश से सवाल-जवाब किए। सत्र का संयोजन कथाकार उमा ने किया।

राजनीति और कविता – सुलगते सवालों पर हुई चर्चा – Parallel Literature Festival

व्याख्यान – राजनीति और कविता विषय पर, कई सुलगते प्रासंगिक प्रश्नों पर चर्चा हुई। चर्चा में विनीत और अशोक कुमार पाण्डेय दर्शकों से मुखातिब हुए। अशोक कुमार ने कहा कि हर चीज़ में राजनीति मौजूत होती है, चाहे वह आपसी सम्बन्ध हों, परिवार हो या मनुष्य का प्रकृति से सम्बन्ध हो। विनीत से समकालीन स्थिति पर अपनी राय रखते हुए कहा कि कविता बाज़ार की राजनीति को पूरी तरह नहीं समझ सकी है। अशोक कुमार पाण्डेय ने तल्ख अंदाज में कहा कि दलितों, महिलाओं और समाज के अन्य वंचित वर्गों के लेखन को भी साहित्य की मुख्यधारा में समाहित किए जाएँ।

रिचार्ज करवाने से मिलेगी सूरज की रोशनी – ज्ञान चतुर्वेदी

जाने – माने व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी की पुस्तक यह दुनिया पागलखाना है पर आधारित चर्चा में कई रोचक बातें हुईं। ईश मधु तलवार से ज्ञान चतुर्वेदी की बातचीत में उन्होने बताया कि बाज़ारवाद हमारी जीवन शैली में पूरी तरह हस्तक्षेप कर चुका है। ये बाज़ारवाद हमारे निजी जीवन तक में इतना प्रविष्ट हो चुका है, कि यह दुनिया एक पागलखाने में तब्दील होती जा रही है। बड़े चुटीले अंदाज में ज्ञान ने कहा कि आज ग़र प्यार हो, और वेलेंटाइन डे पर कार्ड नहीं दें, तो प्यार की कोई कीमत नहीं है। आने वाले समय में शायद सूरज की रोशनी भी उसे ही मिलेगी, जो रिचार्ज करवाएगा।

नोटबंदी का कुत्सित अर्थशास्त्र – Parallel Literature Festival

भीष्म साहनी मंच पर नोटबंदी का कुत्सिक अर्थशास्त्र संवाद के प्रवक्ता अरूण कुमार रहे। सत्र का संयोजन सुरेश दैमान ने किया। संवाद में बताया गया कि किस प्रकार काला धन, नोटबंदी और अर्थव्यवस्था एक – दूसरे को प्रभावित करते हैं। प्रो. अरुण कुमार ने बताया कि नोटबंदी से काले धन पर कोई असर नहीं हुआ। इस निर्णय से उस प्रकार के कोई बदलाव नहीं आए, जैसा सोचा गया था।

हमारा पड़ौस – सुलगते सवाल

shyam_jewellersइस महत्वपूर्ण संवाद में सरिता तिवारी, विधान आचार्य, प्रमोद धिताल ने अपने विचार रखे, वहीं चर्चा का संचालन प्रेम चन्द गाँधी ने किया। गाँधी ने कहा कि नेपाल की राजनीतिक चेतना पूरे उपमहाद्विप के लिए प्रेरणादायक है। दोनों देशों की संस्कृति और समस्याएं भी कमोबेश एक सी हैं। प्रमोद धिताल ने कहा कि राजनेताओं ने निजी स्वार्थ के लिए कुछ मसलों को जटिल बना दिया है।

सम्बन्धों को आम जनता की नजर से देखते हुए बेहतर बनाने की जरुरत है। सरिता तिवारी ने कहा कि कवि सामाजिक प्राणी होने के साथ ही राजनीतिक प्राणी भी होता है।Parallel Literature Festival

नागरिक के रूप में वह प्रतिरोध भी करता है। विधान आचार्य ने कहा कि कवि होना स्वयं में बड़ी जिम्मेदारी है। दोनों देशों की जनता अच्छे सम्बन्ध चाहती हैं, लेकिन यहाँ की सरकारें ऐसा करने में विफल रही हैं।

सरिता तिवारी ने कहा कि नेहरू की नीतियों ने उपमहाद्वीप में छोटे देशों में भारत की प्रभुता स्थापित करने की शुरुआत कर दी थी, वही नीति आज तक चली आ रही है, जो सम्बन्धों में खटास का बड़ा कारण है। भारत को छोटे देशों से बड़े भाई जैसा नहीं, समानता का बर्ताव करना चाहिए। नेपाल में भी शीघ्र ही समानान्तर साहित्य उत्सव का आयोजन करने का संकल्प लिया गया।

कश्मीर : विभ्रम और यथार्थ

सत्र में अशोक कुमार पाण्‍डे, अमित वांचू और जावेद शाह ने कश्मीर के विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि कश्मीर सिर्फ वह नहीं है जो मिडिया में दिखाया जाता है। कश्मीर का नाम आते ही महज आतंकवाद की खबरें सुनने को मिलती है, जबकि कश्मीर से जुड़े सकारात्मक विषयों पर कोई बात नहीं होती।

राजस्थानी कविता पाठ – पी मत जाओ मालवे

पीएलएफ के प्रथम सत्र के नागार्जुन मंच पर राजस्थानी काव्य पाठ में मीठेश निर्मोही मोहनपुरी, जितेन्द्र जोशी, शिव बोधि, सतीश छिपां ने राजस्थानी में काव्य पाठ किया। इसका संचालन पी.एल. पारस ने किया। मोहनपुरी ने दोहे पढ़ते हुए “पी मत जाओ मालवे” दोहे पढ़े। शिव बोधि ने नमक सत्याग्रह आंदोलन पर अपनी एक कविता पढ़ी। जितेन्द्र सोनी ने इंकलाब तथा मीठेश निर्मोही ने थार और प्रीत शीर्षक की कविता पढ़ी।

कहानी पाठ और संवाद

कन्हैयालाल सेठिया मंच पर चरण सिंह पथिक ने कहानीकार वंदना राग से बातचीत करते हुए पूछा कि कहानी को बिना रीढ़ स्वयं खड़ा कर दिया है। ऐसा क्यों? इस पर वंदना ने स्पष्ट किया कि वे भाषा के जालों में न फंसते हुए, अभी सीखने की प्रक्रिया में हूं। उन्होंने अपनी कहानी का पाठ भी किया। साथ ही राग दरबारी मंच पर असमिया कविता पाठ कार्यक्रम में राजीव बारोहा, कविता करमाकर, तूलिका नेतिया ने काव्य पाठ किया। इसका संचालन मीठेश निर्मोही ने किया।

कैसे ठगती है राजनीति

भीष्म साहनी मंच पर राजनीति की ठग विद्या का संचालन करते हुए नारायण बारेठ ने कहा कि आज की संसदीय सत्र सिनेमा से ज्यादा मनोरंजक हो चुकी हैं।राजनीति में चरखे का महत्व सिर्फ फोटो खिंचवाने तक ही सीमित रह गया है। राजनीति की ठग विद्या सत्र में डॉ. नरेश दाधीच से नारायण बारेठ ने बातचीत में राजनीति में झूठे वादों एवं दावों की पोल खोल दी।

चंबल गाथा पर परिचर्चा

चम्बल गाथा – महेश कटारे के उपन्यास काली धार पर आधारित संवाद में चरण सिंह पथिक और डॉ. सुभाष भदौरिया ने चर्चा की। चर्चा में कहा गया कि “जाके बैरी सुख से जीवे, ताके जीवन को धिक्कार” इसका मतलब जिसका कोई दुश्मन नही, उसका जीना बेकार है। महाभारत में 2000 रसोइयों द्वारा गौमांस पकाने का उल्लेख है। चमड़े को धोकर सुखाने पर जो पानी और रक्त की बूंदें गिरी, उससे चंबल का अस्तित्व बना।

चंबल में जो स्थानीय व्यवस्था का विरोध करते थे, उन्हें बागी कहा जाता था, जो बगावत पर उतर आता था। कहानी और उपन्यास में जीवन अलग होता है। उपन्यास कठिनाइयों और समाज को स्पष्ट करता है। कला की पहली शर्त खूबसू रती होती है।

राजस्थानी भाषा के भविष्य पर सवाल

तृतीय सत्र में रांगेय राघव मंच पर राजस्थानी भाषा के महत्व तथा इसे 8वीं सूची में शामिल करने को लेकर संवाद हुआ। भरत ओला के अनुसार राजस्थानी भाषा का दबदबा हमेशा कायम रहेगा, क्योंकि लोगों को अपने परिवेश से प्यार होता है। गौतम अरोड़ा ने बताया कि राजस्थानी भाषा महत्व को लेकर उन्होंने कई आंदोलन किए और बड़ी संख्या में राजस्थानी शब्दों की रिकॉर्डिंग कर गूगल का उपयोग किया, जिससे राजस्थानी भाषा का ज्यादा प्रचार हुआ। इस अवसर पर के सी मालू ने भी राजस्थान भाषा के वर्तमान और भविष्य पर अपने विचार बताएं। कविता पाठ कन्हैया लाल सेठिया मंच पर कविता पाठ के अंतर्गत जितेन्द्र सोनी, वीरू सोनकर, मनोज कुमार शर्मा, मीना बुद्धिराजा ने कविता पाठ किया। जिसका संचालन किया।