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रजलानी गांव की बावड़ी बुझा रही ग्रामिणों की प्यास

गोटन। दिनेश कड़वासरा। गर्मी के इस दौर में जहां एक ओर तालाब -नाडियां सूख जाने से ग्रामीण पानी को लेकर महंगे दामों में टैंकर डलवाने पर मजबूर है वहीं दुसरी ओर रजलानी गांव में राव मालदेव द्वारा वि.सं 1597 में बनाई गई प्राचीन बावड़ी ग्रामिणों के लिए वरदान साबित हुई है, बावड़ी में आज भी भरपूर पानी है जिससे ग्रामीण आज भी अपनी प्यास बुझाते है, गांव में अगर यह प्राचीन जलस्रोत बावड़ी नहीं होती तो ग्रामिणों को दूर दूर तक पानी के लिए भटकना पड़ता या फिर सरकार को लाखों रूपए खर्च कर अन्य व्यवस्था करनी पड़ती, ग्रामीण जब बावड़ी का पानी पीकर प्यास बुझातेे है तो राव मालदेव एंव सेनापति कूंपा व जैता खोखर का नाम लिए बिना नहीं रहते, लगभग पाँच सौ वर्ष पुरानी यह बावड़ी कलात्मक पत्थर से बनी है जो देखने में भी बेजोड़ है, परन्तु आज यह बावड़ी दुर्दशा का शिकार बनी हुई है, बावड़ी की न तो पुरातत्व विभाग ने सुध ली और न हीं प्रशासन ने इस ओर ध्यान दिया, सैंकड़ों वर्ष बाद भी प्राचीन बावड़ी की न तो साफ सफाई हुई है और न हीं इसकी कोई मरम्मत हुई है।

पूर्व सैनिक अमरसिंह पाड़ीवाल बताते है कि इस बावड़ी में कभी भी पानी की कमी नहीं रही, बारिश नहीं होने पर इस बावड़ी का पानी नीचे चला जाता है परन्तु कभी भी खत्म नहीं होता है, अच्छी बारिश होने पर यह बावड़ी लबालब भर जाती है। बावड़ी पर पनघट का नजारा-समाजसेवी मांगीलाल गोदारा बताते है कि गांव की आधी से ज्यादा आबादी बावड़ी का पानी लाकर अपनी व पशुधन की प्यास बुझाते है, पेयजल संकट के चलते पानी के लिए दर्जनों पेडिय़ाँ नीचे उतरकर जाना पड़ता है, अपनी प्यास बुझाने के लिए बावड़ी पर दिनभर पानी लाने के लिए सिर पर घड़ा व मटकियाँ रखी महिलाओं की कतार सी लगी रहती है व यहाँ का नजारा पनघट सा नजर आता है।


बावड़ी पर अस्तित्व का संकट- एनएसयूआई के युवा नेता पारस गुर्जर ने बताया कि उचित संरक्षण व पर्याप्त देखरेख के अभाव में सैंकड़ौं वर्ष पुरानी यह बावड़ी कई जगहों से क्षतिग्रस्त होने के साथ ही इसकी दीवारें भी कई जगहों से टूटने लगी है, प्राचीन बावड़ी पर अस्तित्व के बादल मंडराने लगे है एंव इस बावड़ी के अंदर जाने से भी डर लगने लगता है।
इनका कहना है-गांव में बनी प्राचीन बावड़ी आज हमारे लिए वरदान साबित हो चुकी है, परन्तु गंदगी व उचित देखरेख के अभाव में पानी भी दुषित हो रहा है, परन्तु प्रशासन व जनप्रतिनिधियों ने भी आज तक इस ओर ध्यान आकर्षित नहीं किया है”- सुनील पाड़ीवाल (छात्र नेता व तहसील संयोजक राजसू)